Monday, June 15, 2015

मोहब्बत की डोर

जैसे हवा
रहती है हर जगह
वैसे ही अब तुम रहती हो

हवा दिखाई नहीं देती
लेकिन अपने होने का
अहसास करा देती है

कभी दरवाजे को
हल्का सा थपथपा कर
तो कभी पेड़ की पत्तियों को
धीरे से सरसरा कर

तुम भी हवा की तरह
थिरकती रहती हो
मेरे चहुँ ओर

कभी निकल जाती हो
बगल से छू कर
तो कभी बिखर जाती  हो
खुशबू बन कर

दिल खिल जाता है
हो जाता है दिप-दिप
लगता है झूमने
तुम्हारी खुशबू में डूब कर

सन्दली हवाओं के
धागों से आज भी बंधी है
हमारी मोहब्बत की डोर।


 [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]















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