Tuesday, June 30, 2015

मन की पीर

तुम मुझे
जीवन के राहे-सफर में
अकेला छोड़ कर चली गई

तुमने यह भी नहीं सोचा कि
कल सुबह कौन पिलाएगा मुझे
अदरक वाली चाय

कौन बनाएगा मेरे लिए
केर-सांगरी का साग और
मीठी आंच पर रोटी

कौन खिलायेगा मुझे 
दुपहर में चाय के साथ
घर पर बनी मीठी-मीठी केक

जब दुखेगा मेरा सिर 
तब कौन दबाने आएगा 
अपने नरम-नरम हाथों से

जब तुम नहीं रहोगी 
साथ में तो कैसे काटूँगा
मैं जिंदगी के दिन

कैसे पूरी करूंगा
अपने जीवन की अधूरी
कविता को 

कौन बताएगा मुझे कि
प्रेम की परिणति दुःख है
या दुःख की पराकाष्ठा प्रेम है।




                                               [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]




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