Saturday, June 27, 2015

अपनी विरासत

गाँवों में लोग आज भी
देते है सूर्य को अर्द्ध और
सिंचते हैं तुलसी को जल

आज भी वहाँ पड़ते हैं
सावन के झूले और
गूंजते हैं कजरी के बोल

औरते रखती है चौथ का
व्रत और करती है
निर्जला एकादसी

भोरा न भोर उठ
करती है ठन्डे पानी से स्नान
रखती है व्रत कार्तिक मासी

दिवाली में गोबर से
निपती घर,हिरमच गेरू से
मांडती है रंगोली

होली में बच्चे-बुड्ढे
हो जाते एक और लगा रंग
खेलते होली

कुत्ते को कौर,गाय को रोटी
आए भिखारी को ठंडी बासी
नहीं जाने देते किसी को खाली हाथ

गांव आज भी
संजोए हुए हैं अपनी विरासत
बटाते हैं दुःख सुख में एक दूजे का हाथ।









 

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