Friday, September 2, 2011

हरा पत्ता

जब पीला पत्ता
डाल से गिरता है
हरा पत्ता थोड़ा
कांप उठता है

लेकिन
थोड़ी देर बाद  
शान्त हो जाता है 

बसंतआते ही
हरा पत्ता फिर
लहलहा ने लगता है 

वो नहीं जानता
मरने के बाद
आत्माओं के सफ़र
के बारे में। 


कोलकता 
२ सितम्बर, २०११

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )


Monday, August 22, 2011

कौआ आकर बोलता है

जब भी घर में कोई
नया सदस्य जुड़ने वाला होता है
कौआ उससे पहले आकर
बोलने लग जाता है 

चाहे घर में बहु के बच्चा
होने की आश हो
चाहे घर में बेटे की सगाई
होने की बात हो

कौआ खिड़की पर
आकर जरूर बोलेगा
एक दो दिन नहीं
कईं दिनो तक बोलेगा 

सबको अपनी भाषा में
पहले से ही बता देगा कि 
घर में कोई नया प्राणी आयेगा

कौए का खिड़की पर 
बैठ कर बोलना
यानि की घर में एक
नए सदस्य का जुड़ना 

ये आज से नहीं कई
बरसों से हो रहा है
कौआ आकर शुभ सूचना
पहले से ही दे रहा है

एक बार माँ ने कहा --
इस बार तुम्हारा कौआ
झूठा निकलेगा  

नहीं कोई बहु का
पाँव भारी है और 
नहीं कोई घर में
होने वाली सगाई है 

लेकिन कुछ दिन बाद ही
माँ ने खुश खबरी दी
बहु का पाँव भारी है
सबको बधाई दी 

कौआ जब भी बोला 
सच बोला 
कभी झूठ नहीं बोला 

कौआ कभी झूठ
बोलता भी नहीं और
सच बोलने वाले को
काटता भी नही। 


कोलकत्ता
 २२ अगस्त, २०११ 
\

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )











Wednesday, August 17, 2011

मेरी सुबह



   
आज  कल
 मै प्रकृति के संग
 रहता हूँ

रोज सवेरे
 मुझे सूरज उठाने आता है
किरणों को भेज कर
मुझे जगाता है 

मै निकल जाता हूँ
प्रातः  भ्रमण के लिए
अपनी सेहत को तरोताजा
रखने के लिए 

रास्ते में
ठंडी- ठंडी  हवाएं  
 तन -बदन को शीतलता
प्रदान करती  है 

पेड़ो की
 डालियाँ  झुक-झुक कर 
   अभिनन्दन करती है

जूही, बेला,
 चमेली की खुशबू   
 वातावरण को सुगन्धित
कर देती है

पंछी मुझे देख
कर चहचहा उठते हैं
मौर मुझे देख नाचने लगते हैं  

भंवरे मेरे
 लिए गुंजन करते हैं
हिरन मेरे लिए चौकड़ियां भरते हैं

प्रकृति   ने    
   कितना कुछ दिया  है     
कितने प्यार से मेरा स्वागत किया है 

ये झरने,ये झीले
  ये नदी, ये पहाड़ 
          सभी प्रकृति ने बनाये हैं मेरे लिए          
कितने रंगों से सजाया है मेरे लिए

बड़ी अच्छी
 लगती है सुबह की घड़ी
चहकते पंछी और महकते फूलों की लड़ी। 


कोलकत्ता  
१७ अगस्त, २०११
(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )





Tuesday, August 16, 2011

करुणा बरसाओ

                                                                       

 हे अन्तर्यामी प्रभु !
तुम सर्वब्यापी हो
अनादि और अनन्त हो

सब देखते हो
सब की सुनते  हो
 मैं क्या कहना चाहता हूँ
वह भी जानते हो

मैंने आज तक
तुमसे कुछ नहीं माँगा
जो तुमने दिया
   वो मैंने लिया 

आज मैं
 पहली बार तुमसे कुछ 
माँग रहा हूँ

  मेरा बस
इतना काम कर दो
सुशीला को फिर से
  स्वस्थ और निरोग करदो

 तुम तो
अनादि काल से दया
 ममता और  करुणा के सागर
कहलाते हो 

फिर बताओ
तुम उसे अपनी करुणा
 से कैसे वंचित रखोगे ?

यदि उसे कुछ हो गया
तो मेरी तमाम जिन्दगी
     शाम का धुंधलका बन
   कर रह जाएगी

लेकिन प्रभु !
 तुम्हारा भी तो
दयावान और करुणा का
रूप बिखर जाएगा

तुम्हारी
एक करुणा मेरे
   जीवन में सैकडों चन्दन
  मंजुषाओं की सुगंध बिखेर देगी

मेरे जीवन पथ के
कंकड़ -पत्थरों को
हीरों की तरह चमका देगी

 कल सारा
 संसार जानेगा कि
 तुमने सुशीला पर अपनी
 करुणा बरसाई

 जैसे तुमने
मीरा, अहिल्या और द्रोपदी
पर बरसाई।


कोलकता                                                                                                                                            
१६ अगस्त २०११

(यह कविता "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )



Friday, August 12, 2011

अच्छा लगता है



अच्छा लगता है
सुबह की गर्म चाय के साथ
 अखबार का पढ़ना 

अच्छा लगता है
गुनगुनी धूप में बैठ कर
 सर्दी को भगाना

अच्छा लगता है
आँगन में हरसिंगार के
 फूलों का महकना

अच्छा लगता है
घर आये मेहमान को
बांहों में भरना

अच्छा लगता है
प्रातःकाल दोस्तों के साथ
 विक्टोरिया घूमना

अच्छा लगता है
शर्मा की दूकान पर कचौड़ी
के साथ गर्मागर्म जलेबी खाना 

अच्छा लगता है
जो मन मे आये वो लिखना
और सहेज कर रख लेना   |



कोलकत्ता
१२  अगस्त, २०११

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

गुस्सा क्यों नहीं आता


भाई धर्मचंद
तुम मुझे बताओ कि
तुमको गुस्सा क्यों नहीं आता 

तुम किस मिटटी के बने हो यार 
कोई भी घटना घटित हो जाए  
मगर तुम को कुछ नहीं होता 

 आज दीघा से
वापिस कोलकता आते समय 
अविनाश १२० की स्पीड पर 
 गाडी चला रहा था

टर्निंग पर उसने गाडी को
इस तरह से काटा
कि गाडी दो चक्कों पर आ गई 
लेकिन तुम्हारे कुछ नहीं हुवा
तुम्हारा मन शांत था

यदि अविनाश के पास
 मैं बैठा होता
चाहे जितना लाडला हो 
मै थप्पड़ लगा देता

उसको बता देता कि
मोड़ पर गाडी को
किस तरह से काटा जाता ?  

जबकि तुम 
मेरी तरफ देख कर
मुस्करा रहे थे

मुझे
आये गुस्से का
मजा ले रहे थे

आज तुम मुझे बताओ
कि तुम्हें गुस्सा
क्यों नहीं आता ? 

NO 


कोलकात्ता
११  अगस्त, २०११
  

Wednesday, August 10, 2011

दूधों नहाओ - पूतों फलो



सरकार चाहे जितना
भी खर्च कर दे
इस देश की आबादी
पर नियंत्रण मुश्किल है

हमारे देश की तो मिट्टी
को ही वरदान प्राप्त है
यहाँ खेत से सीता निकलती है
पत्थर की शिला से अहिल्या निकलती है

कान से कर्ण निकलता है 
घड़े से अगस्त्य निकलता है
खम्बे से नरसिंह का प्रकाट्य होता है

ये महान देश है
इसकी महान परम्पराएँ हैं 
यहाँ पाँव छूने पर भीं बहुओं को 
दूधों नहाओ और पूतों फलो
का आशीर्वाद दिया जाता है। 

बच्चों को यहाँ रामजी की
देन समझा जाता है  
इस देश की आबादी पर
नियंत्रण कैसे संभव है ?



कोलकत्ता
१० अगस्त, २०११

(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )