Friday, August 12, 2011

अच्छा लगता है,



अच्छा लगता है
सुबह की गर्म चाय के साथ
 अखबार का पढ़ना। 

अच्छा लगता है
गुनगुनाती धूप में बैठ कर
 सर्दी को भगाना। 

अच्छा लगता है
आँगन में हरसिंगार के
 फूलो का महकना। 

अच्छा लगता है
घर आये मेहमान को
बांहों में भरना। 

अच्छा लगता है
प्रातःकाल दोस्तों के साथ
 विक्टोरिया घूमना। 

अच्छा लगता है
शर्मा की दूकान पर गर्म 
गर्म चाय पीना। 

अच्छा लगता है
जो मन मे आये वो लिखना
और सहेज कर रखना  |



कोलकत्ता
१२  अगस्त, २०११
(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )

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