Wednesday, August 17, 2011

मेरी सुबह



   
आज  कल
 मै प्रकृति के संग
 रहता हूँ। 

रोज सवेरे
 मुझे सूरज  उठाने आता है
किरणों को भेज कर
मुझे जगाता  है। 

मै निकल जाता हूँ
प्रातः  भ्रमण के लिए
अपनी सेहत को तरोताजा
रखने के लिए।  

रास्ते में
ठंडी-  ठंडी  हवाएं,  
 तन -बदन को शीतल
कर देती है। 

पेड़ो की
 डालियाँ  झुक-झुक कर 
   अभिनन्दन करती है। 

जूही, बेला,
 चमेली की खुशबू   
 वातावरण को सुगन्धित
कर देती है। 

पंछी मुझे देख
कर चहक उठते हैं,
मौर मुझे देख कर नाचने
लगते है। 

भंवरे मेरे
 लिए गुंजन करते हैं,  
हिरन मेरे लिए चौकड़िया
      भरते हैं। 

प्रकृति   ने    
   कितना कुछ दिया  है.    
कितने प्यार से मेरा स्वागत
 किया है। 

ये झरने,ये झीले,
  ये नदी, ये पहाड़,   
          
सभी प्रकृति ने
 बनाये  हैं मेरे लिए ,
कितने रंगों  से  सजाया है
 मेरे लिए।

बड़ी अच्छी
 लगती है सुबह की घड़ी,
चहकते पंछी और महकते फूलों
 की लड़ी। 


कोलकत्ता  
१७ अगस्त, २०११
(यह कविता  "कुमकुम के छींटे" नामक पुस्तक में प्रकाशित है )





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