Wednesday, May 5, 2021

यह दिन तो सकुशल गुजर गया

दिन तो सकुशल गुजर गया 
रात बस अब ढलने को है,
जीवन-सफर तो रीत गया
अब नए सफर की तैयारी है। 

सब कुछ तो कर लिया 
फिर भी प्यास बुझी नही,
यह आदिकाल से बनी रही
आजीवन तो मिटी नहीं। 

इच्छा तो बढ़ती जाती है
वो कभी नहीं घटती प्यारे,
पर ये साँसें तो सीमित हैं
वे कभी नहीं बढ़तीं प्यारे।

रूप-चाँदनी दो दिन की
क्षणभंगुर यह जीवन है,
जो आया है वह जायेगा
कोई भी नहीं अनश्वर है। 

अब आवाहित को आना है
इस पंछी को उड़ जाना है,
और कंचन जैसी काया को
कुछ क्षण में जल जाना है। 

( यह कविता स्मृति मेघ में प्रकाशित हो गई है। )







Sunday, May 2, 2021

समय बहुत बुरा आया

समय बहुत बुरा आया,  घर में रहने को मजबूर 
घर के दीपक बुझ रहें, सपने हो रहे सबके चूर। 

                                         छोटा सा एक कोरोना वायरस, निकला बड़ा मगरूर
                                          यह मौत का सौदागर निकला, ले जाता दुनिया से दूर। 
                                       
आतंक इसका इतना फैला, विश्व  में हो गया मशहूर
इससे यदि बचना है, प्रतिरोधक समता बढ़ाएँ जरूर। 

                                               एक वायरस ने तोड़ा, पूरी मानव जाति का गुरुर
                                               हाथ मिलाना, गले लगाना,  इसको नहीं है मंजूर।             

इससे यदि बचना चाहो, सबको रहना होगा दूर- दूर         
मुँह पर मास्क लगाओ सभी, बना इसे जीवन दस्तूर।

                                              बार-बार हाथों को धोना, करते रहना सब जरूर                                                                                                       निरोधक क्षमता वाले ही, बचा पाएंगे अपना नूर।  
                                              

( यह कविता स्मृति मेघ में प्रकाशित हो गई है। )




Friday, April 23, 2021

कुम्भ का मेला

हरिद्वार में 
कुम्भ का मेला  
लाखों की संख्या में साधु -संत 
और नागा सन्यासी 
बहुत बड़ा भक्तों का रेला। 

पंडालों में चारो तरफ 
भजन-कीर्तन चल रहा 
कहीं कम्बल बँट रहा 
तो कहीं भंडारा चल रहा। 

महामण्डलेश्वर आचार्य 
महामण्डलेश्वर महंत और 
अखाड़ों का बड़ा जमघट 
कोरोना महामारी का 
सबसे बड़ा संकट। 

सरकारी गाईड लाइन्स का 
पालन नहीं हो रहा 
हजारों में कोरोना संक्रमण 
फ़ैलता जा रहा। 

भक्तगण निश्चिन्त
कहीं भय का भाव नहीं 
जहाँ ईश्वर साथ है 
वहाँ डर का कोई प्रभाव नहीं। 


( यह कविता स्मृति मेघ में प्रकाशित हो गई है। )



 

Wednesday, April 21, 2021

कितना अच्छा लगता है

संध्या के समय 
गीता भवन के घाट पर 
नौका में बैठ कर 
नदी में बहती 
सुनहली-रुपहली 
मछलियों को देखते हुए 
आटे की गोलियाँ डालना
कितनाअच्छा लगता है ? 

गंगा की निर्मल लहरों को 
एक टक देखना 
और देखते-देखते 
स्वयं उनमें खो जाना 
कुछ देर के लिए ही सही 
मगर कितना अच्छा लगता है ?  


( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )

असमर्थों का मान

अयोध्या में हनुमान ढ़ी
हनुमान जी का प्रशिद्ध मंदिर 
अंदर भक्तों की भीड़ 
आरती और जयकारों से 
गूंजता मंदिर। 

बाहर सीढ़ियों के पास 
भिखारियों की 
लम्बी कतारें 
पंक्तिबद्ध बैठे हैं भिखारी 
सामने तसलों की कतारें। 

भक्तगण 
आते हैं बाहर 
फेंकते है चंद सिक्कें 
गिर जाते हैं 
कटोरों के भीतर-बाहर। 

मन में नहीं है भाव
कि इनको भी दें आदर से 
असमर्थों का मान भी 
बढ़ाया जा सकता है 
हाथ में देकर प्यार से। 



( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )

Tuesday, April 20, 2021

जब मैं नहीं रहूँगा

जब मैं नहीं रहूँगा 
तब कोई नहीं आयेगा 
मेरा नाम लेकर बुलाने 
कि भागीरथ जी 
है क्या घर मे ? 

जब मैं नहीं रहुँगा 
फिर कोई दोस्त 
नहीं आएगा 
मेरे बारे में पूछने 
कभी इस घर में। 

जब मैं नहीं रहूँगा 
गाँव के लोग पुछेंगे 
कहाँ  रह गये 
हम सब के साथी 
क्या छोड़ आये घर में। 

जब मैं नहीं रहूँगा 
कुछ वर्षों बाद 
आगंतुक पूछेंगे 
किस की लगी है 
यह तस्वीर घर में। 


Wednesday, April 14, 2021

मातृभाषा कराह रही है

आज के बच्चे जो 
पढ़-लिख गए हैं 
अंग्रेजी बोलने में ही 
गर्व का अनुभव करते हैं।   

अपनी मातृभाषा में 
बात करने में अब 
उनकी जबान ऐंठती है। 

ठंडे ज़ायक़े को 
दिमाग में घोलते हुये 
विदेशी भाषा बोलने में ही 
अपनी शान समझते है। 

भूले से भी नहीं दिखती 
उन्हें अपनी जमीन  
जिसकी जड़ों को लगातार 
काट रहे हैं। 

आत्मप्रदर्शन और   
आत्मप्रशंषा के शिकार 
खुदगर्जों के पार्श्व में बैठी 
मातृभाषा आज कराह रही है। 



( यह कविता स्मृति मेघ में प्रकाशित हो गई है। )