Wednesday, July 1, 2015

जीवन में हमसफ़र चाहिए

 बिन हमदम के जीवन सूना 
 मुस्किल है बिन साथी जीना 
 जैसे मछली को नीर चाहिए 
  जीवन में हमसफ़र चाहिए। 

                                   दोनों का है सम्बन्ध सलोना    
                                    एक दूजे  बिन जीवन सूना  
जैसे मोती को चमक चाहिए                                                        
     जीवन में हमसफ़र चाहिए।                                                         

 दुःख-सुख दोनों साथ निभाते    
  हँस-हँस कर के जीवन जीते   
     जैसे सागर को तट चाहिए   
    जीवन में हमसफ़र चाहिए।  
           
संग सफर से जीवन महके                                                     
         पतझड़ में भी सावन चहके                                                              
         जैसे रजनी को चाँद चाहिए                                                              
          जीवन में हमसफ़र चाहिए।


 [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]                                                           
 




Tuesday, June 30, 2015

मन की पीर

तुम जीवन के
राहे -सफर में मुझे
अकेला छोड़ कर चली गई

तुमने यह भी नहीं सोचा कि
कल सुबह कौन पिलाएगा मुझे
अदरक वाली चाय

कौन बनाएगा मेरे लिए
केर-सांगरी का साग और
मीठी आंच पर रोटी

कौन खिलायेगा 
दुपहर में चाय के साथ
मीठी-मीठी केक और पेस्ट्री

कौन घुमायेगा
मेरे बालों में अपनी
नरम-नरम अंगुलियाँ

कौन फंसेगा
मेरे संग जीवन की
शतरंजी चालों में

बिना तुम्हारे 
कैसे पूरी कर पाउँगा 
जीवन की अधूरी कविता को 

कैसे भूल पाउँगा
तुम्हारे संग देखे
जीवन के ख़्वाबों को। 


                                               [ यह कविता "कुछ अनकहीं " में छप गई है।]




Saturday, June 27, 2015

अपनी विरासत

गाँवों में लोग 
आज भी देते है सूर्य को अर्द्ध 
सिंचते हैं तुलसी को जल

आज भी वहाँ 
पड़ते हैं सावन के झूले 
गूंजते हैं कजरी के बोल

औरते रखती है 
चौथ का व्रत और करती है
निर्जला एकादसी

भोरा न भोर 
करती है ठन्डे पानी से स्नान
रखती व्रत कार्तिक मासी

दिवाली में 
गोबर से निपती है घर
 मांडती है रंगोली

होली में 
बच्चे-बुड्ढे हो जाते एक 
लगाते रंग, खेलते हैं होली

गांव आज भी 
पुरखों की बनाई व्यवस्था 
पर गर्व करते हैं 

अपनी विरासत को 
पीढ़ी दर पीढ़ी संजोए 
रहते हैं। 



( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। )






Thursday, June 25, 2015

चलो भीगते हैं

कलकत्ते में 

आ गया मानसून 
सुबह से झमाझम 
पानी बरस रहा है 

वर्षा की फ़ुहारों संग 
बरसने लगी है 
तुम्हारी यादें

बरसात में भीगने 
का तुम्हें बहुत 
शौक था 

बरसात आते ही 
तुम सदा मेरा 
हाथ पकड़ कहती 
चलो भीगते हैं 

हर बारिश में 
तुम ले जाती 
मुझे अपने साथ 

बारिश की बूंदों में तो 
आज भी वही ताजगी 
और शरारत है 

मगर आज तुम नहीं हो 
अब कौन कहेगा मुझे 
चलो भीगते हैं 

काश !
तुम आज मेरे साथ होती 
और हाथ पकड़ कहती 
चलो भीगते हैं। 

( यह कविता "स्मृति मेघ" में प्रकाशित हो गई है। ) 




Friday, June 19, 2015

तुम अगर आओ तो

तुम अगर आओ तो
आज भीगने चले
बारीश की बौछारों में

तुम अगर आओ तो
आज संग-संग दौड़े
हँसती हरियाली में

तुम अगर आओ तो
आज बाग में घूमने चले
भौंरों के गुंजारों में

तुम अगर आओ तो
आज प्यार बरसाए
चमकती चांदनी में

तुम अगर आओ तो
आज मिलन गीत गाऐं
बासंती हवाओं में

तुम अगर आओ तो
आज झूलों पर झूले
सावन की बहारों में।


  [ यह कविता 'कुछ अनकही ***"में प्रकाशित हो गई है ]


Tuesday, June 16, 2015

आज भी बसी हो मेरी यादों में

कौन कहता है
कि तुम चली गई
तुम तो आज भी बसी हो
मेरी यादों में

मेरी साँसों में
मेरे दिल में और
अब तो तुम आने लगी हो
मेरी बातों में

दो साल से
तुम्ही तो छाई हुई हो
मेरी कविताओं में

अगले जन्म में
तुम फिर मिलना
मुहब्बत का फूल लिए
हाथों में

मेरे जैसा दीवाना
भला कहाँ मिलेगा तुम्हें
इस बेगानी दुनियां में।


 [ यह कविता "कुछ अनकही ***" में प्रकाशित हो गई है। ]




अब मैं क्या करूँ ?

तुम  तो बिना कहे चली गई, मुझे अकेला छोड़ 
मेरे जीवन में अन्धेरा छा गया, अब मैं  क्या करूँ ?


                               जब तक तुम साथ थी, अरमान मचलते थे
                              आज बिखर गया जीवन, अब मैं क्या करूँ ?

तुम्हारी बातें, तुम्हारे हंसी, सभी याद आती है 
दिल से नहीं निकली यादें, अब मैं  क्या करूँ ?


                         तारों को गिनते हुए कटती है, मेरी काली रातें 

                         ख्वाबों का चमन उजड़ गया, अब मैं क्या करूं  
  
तुम्हारे बिछोह की आग को,अब मैं कैसे बुझाऊँ 
किसी  किताब  में नहीं लिखा, अब मैं क्या करू ?

                          तुम्हारे जाते ही, मेरा कल मुझ से रूठ गया 
                          मेरा जीवन तनहा हो गया, अब मैं क्या करूँ ?   


###################