Sunday, September 7, 2014

आवौ आपा उछब मनावां

बरसा न बरस स्यूं
सालो-साल आपा करा
कुँवारी कन्या री पूजा
आपणी श्रद्धा सारू

छोटी छोटी कुँवारी कन्यावां ने
देवा निमंत्रण
बुलावा बानै
महालया रे दिन

आपणे घरां री लुगायां
धोवै बारा पगल्या
पुंछ गमछा स्यूं
लगाव कुंकु और
करे नमन समझ
दुर्गा रे उणियारै

माथै तिलक लगावै
भेंट देवै मोकळो सामान
जको काम आवै
पांच स्यूं दस साल री
कुँवारी कन्यावा रै पढने-लिखने

बूढी'र विधवां रो भी
करा आपा सम्मान
देवा बानै भी  पैरण
को सामान

जीवण री आपाधापी स्यूं
थोड़ो टेम काढ़'र आवो
आपा सगळा सागै मिल'र
पुजा कुँवारी कन्यावां नै
देवा कपड़ा बूढी'र विधवाओं ने
नवरात्रा के दिना में।























5 comments:

  1. आपकी लिखी रचना बुधवार 10 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

    ReplyDelete
  2. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  3. राजस्थानी बहुत प्यारी बोली है इसमें कही गयी बात सीधी दिल में उतरती है
    सभी स्त्री वर्ग का सम्मान करना और उन्हें देवी मानना हमारी विरासत में है
    अच्छी सोच और गजब का लेखन

    स्वागत है मेरी नवीनतम कविता पर रंगरूट

    अच्छा लगे तो ज्वाइन भी करें
    आभार।

    ReplyDelete
  4. दिल से आभार आपका।

    ReplyDelete
  5. यशोदा बहन आपका बहुत बहुत धन्यवाद।

    ReplyDelete